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ज़ारा तो नहीं थी वह

वह कहाँ खो जाया करती थी, दिन कहाँ गुज़रा करते थे,
उसके आंसू सूख से गए थे कब के,
पर वीर को एहसास तक नहीं हुआ, शायद. 

एक हलका सा एहसास, उसकी आहट की याद सी
जिसके आसरे वो जी लिया करती थी
ज़ारा थी वो वीर की, बस इतना ही समझा करती थी.

सदियों से वीर हैं, खेलते आ रहे जो
कहलाते तो वीर हैं पर झूठ पे जिया करते हैं
खिलौने सा दिल, उनके क्रूर हाथों में
टूट कर बिखरने की आदत ही डाल देता है
करता भी क्या मासूम सा दिल, बहलाते इतना जो हैं वह. 

ज़ारा तो नहीं थी वो, मगर ढाला था वीर ने उसे ज़ारा के सांचे में
यह सोचकर कि जैसे चाहे वैसे खेल लेंगे उसके साथ
पर वो नहीं जानता था, कि बेटी थी वो स्वयं देवों की
सोचने तक की देरी कर दी, हज़ारों फ़रिश्ते उतर गए थे
ज़ारा को दलदल से निकालने, उसकी हिफ़ाज़त खुद करने

चाहे हज़ारों ऐसे वीर क्यों न कोशिश करें,
नहीं तोड़ सकते वह ज़ारा का दिल,
स्वयं देवता करते हैं उसकी रक्षा
हर युग में रहा करेंगे वह उसके साथ
कभी साथी बनकर, कभी दोस्त,
कभी अदृश्य परी बनकर, कभी फरिश्ते

कल तक उसको एहसास नहीं था उनका
आज वह जीती ही उनके प्रेम में है

Author:

As within, so without

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